विवाह है योग

आज 24 अक्टूबर की कृश्नांश कथा में मनिदेवकी ने बताया कि ज्ञान की आवश्यकता हमेशा जीवन मे रहती है। 5 dimensions होती हैं ज्ञान को। 
विवाह में समस्याएं भी ज्ञान की कमी के कारण होती है।

स्वयम्वर की परंपरा हमेशा से रही, परन्तु कन्या में स्वयं ही वर चुनने की योग्यता होनी चाहिए। पार्वती ने स्वयं चुना शंकर को, और तपस्या की जिससे शंकर भी उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करें। तपस्या का अर्थ है तन, मन और आत्मा से एक ही कर्म में लग्न हो जाना। समर्पण पूर्ण होना चाहिए। शुक्राचार्य ने female की सीरत बनाई, और design इस तरह से बनाया गया कि यदि तन और मन से कन्या समर्पित हो जाती है, तो उसका आत्मा नैचुरली उसमे जुड़ जाता है। ब्रह्मा ने बनाया स्त्री का physical रूप, और देवो और दानवों के गुरु शुक्राचार्य ने बनाई सीरत कन्या की। अश्वनीजी शुक्राचार्य नारीज्ञान के expert हैं, और ऐसी सभी जानकारी उन्होंने उपलब्ध करवाई। आत्मा यानी ऊर्जा का warehouse। और सूर्य को परमात्मा भी इसीलिए कहा गया क्योंकि हम अपनी effeciency के अनुसार सूर्य से energy लेते रहते हैं। चन्द्रमा देता है शीतल energy जिससे ज्ञान जागता है। और सूर्य देता है गर्म energy जो कि germs infection को मारती है। 
शंकर ने पार्वती जी की तपस्या से प्रसन्न होकर पार्वती जी को पत्नी रूप में स्वीकारा। राजा दक्ष, जो पार्वती के पिता थे, उन्हें यह विवाह स्वीकार्य नही था।
परन्तु प्रकृति के नियम को समझते हुए उन्होंने पार्वती का विवाह करवाया।
कालांतर में परम्परा स्वयम्वर की तो रही लेकिन किन राजकुमारों को invite करना है, यह निर्णय पिता ही करते रहे। 
हर युग मे सीखना जरूरी होता है कि ज्ञान कैसे use करना है। इसीलिए कलियुग में निष्छल temples की स्थापना की गई है। जिस दिशा का ज्ञान चाहिए उसी निष्छल temple में जाएं। 

कन्या का गुरु उसका पति होता है। इसलिए जब कन्या की योग्यता इतनी आ जाती है, तब वो पुरुष उसके पास आता है जो उसका गुरु बनने योग्य होता है। माता पिता चाहते है कि विवाह योग बने, समर्पण रहे जीवन मे तो कन्या को सिखाएं कि अपने सभी molecules को कैसे balance में रखे, और जब वह अपने पति को पहचाने, तो उसके निर्णय को स्वीकारें।

जब arranged marriage के लिए भी माता पिता वर ढूंढने निकलते है तो उन्हें यही देखना है कि जिसे दामाद बना रहे हैं, वह कन्या का गुरु बनने के योग्य है या नही।
इसके लिए अब z seed analysis करवाएं, जिसे यह जान सकते हैं को विवाह में satisfaction रहेगा या नही। दोनों एक दूसरे को dedicated रह पाएंगे या नही।

पहले लड़का लड़की का योग होता है, फिर विवाह करवाया जाता है। विवाह 2 परिवारों के बीच मे होता है। इसलिए जरूरी है कि विवाह में दोनों के माता पिता की रजामंदी हो, और दोनों के कुटुम्ब भी सम्मिलित हो विवाह में। कलियुग के युगल भगवान कृश्नांश और संतुष्टि इपदेवी का विवाह इसी प्रकार हुआ, इसलिए जीवन हर प्रकार से आनंदमयी रहा उनका।

लक्ष्मी जो कि समुद्र मंथन से बाहर आई, उन्होंने विष्णु को अपना पति वर लिया, लेकिन विष्णु ने लक्ष्मी को अपनी पत्नी नही स्वीकारा, इसलिए उनका विवाह नही हुआ।

विवाह का output होती है सन्तान, इसलिए गुण मिलाना नही, z seed मिलना जरूरी है। समर्पण के लिए दोनों के तत्व  बैलेंस में हो और जुड़ना चाहते हो। जुड़े रहने के लिये लगातार effort करते रहें।

श्वासयोग से स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है। 18 तत्वों के मालिक हैं कृष्णईष्ट भगवान, और 6 molecules है जिनसे योनि मुक्त होती है पांच चोर से। 

तभी विवाह बंधन से मुक्त रहेगा, योग बनेगा।

कृश्नांश कथा youtube channel manidevki पर सुन सकते हैं
https://youtu.be/XmiMOdii7F8

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